श्री मदन मोहन जी का इतिहास और श्री सनातन गोस्वामी जी का समर्पण वृंदावन की पवित्र परंपरा की एक अद्भुत कथा है।
यह कहानी बताती है कि कैसे भगवान ने अपने भक्त की भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं को उन्हें समर्पित कर दिया।
श्री मदन मोहन जी की मूल मूर्ति और सनातन गोस्वामी का समर्पण
मूल मूर्ति का निर्माण: श्री मदन मोहन जी की मूल प्रतिमा भगवान श्री कृष्ण के प्रपौत्र, वज्रनाभ जी ने बनवाई थी।
चौबे जी की सेवा: वज्रनाभ जी के वृद्ध होने पर, यह मूर्ति मथुरा के एक चौबे (ब्राह्मण) परिवार को सौंप दी गई, जिनकी पत्नी प्रेमपूर्वक विग्रह की सेवा करती थीं।
सनातन गोस्वामी को समर्पण: श्री चैतन्य महाप्रभु के शिष्य श्री सनातन गोस्वामी, जो काली देह घाट के पास द्वादश आदित्य टीला पर एक कुटिया में रहते थे, प्रतिदिन मधुकरी (भिक्षा) के लिए मथुरा जाते थे।
जब चौबे जी की पत्नी बहुत बूढ़ी हो गईं, तो उन्होंने मदन मोहन जी की सेवा का भार सनातन गोस्वामी जी को सौंप दिया, क्योंकि ठाकुर जी ने स्वयं उन्हें स्वप्न में इसके लिए आज्ञा दी थी।
सरल सेवा: सनातन गोस्वामी जी अत्यंत वैरागी थे और भिक्षा पर निर्भर रहते थे, इसलिए वे मदन मोहन जी को केवल सूखी रोटियों का भोग लगाते थे।
भक्त वत्सल भगवान: एक बार, जब सनातन जी यमुना पार
करने के लिए एक नाविक के इंतज़ार में थे, तो मदन मोहन जी
ने एक ग्वाले के वेश में आकर उनकी मदद की और उनकी
निष्ठा देखकर प्रसन्न हुए। ठाकुर जी ने सनातन जी से खीर
बनवाने की इच्छा प्रकट की। जब सनातन जी ने कहा कि
उनके पास साधन नहीं हैं, तो भगवान ने स्वयं राधा रानी को गोलोक से खीर के लिए आवश्यक सामग्री लाने के लिए भेज दिया।
इस घटना से पता चलता है कि भगवान अपने भक्त के प्रेम के भूखे हैं।
मंदिर का निर्माण: बाद में, कृष्ण दास कपूर नामक मुल्तान के
एक धनी व्यापारी ने सनातन गोस्वामी जी की देखरेख में मदन
मोहन जी के लिए एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया, जो
वृंदावन के पहले और सबसे पुराने मंदिरों में से एक माना जाता है।
वर्तमान स्थान: औरंगज़ेब के आक्रमण के दौरान, मूल मूर्ति को
सुरक्षित रखने के लिए 1670 में राजस्थान के करौली में स्थानांतरित कर दिया गया, जहाँ वह आज भी विराजमान है।
वृंदावन के मूल मंदिर में अब मूल प्रतिमा की प्रतिकृति की पूजा की जाती है।