श्री चैतन्य चरित्रामृतम

Monday, 23 February 2026

प्रेम की ओढ़नी: भक्त और भगवान के अटूट बंधन की कथा! ❤️

❤️ प्रेम की ओढ़नी: भक्त और भगवान के अटूट बंधन की कथा! ❤️

वृंदावन की पावन भूमि के समीप, यमुना किनारे बसे एक छोटे से गाँव में एक भोली-भाली ग्वालिन रहती थी, जिसे सब प्यार से ‘माई पंजीरी’ कहते थे। पंजीरी का जीवन अत्यंत सादा था, न कोई अपना था, न पराया। बस एक ही सहारा था—उसके ठाकुर मदनमोहन जी।
दूध बेचना ही उसकी जीविका थी, लेकिन उसका असली जीवन तो मंदिर की चौखट पर शुरू होता था।

नित्य नियम और विवशता:


माई का एक अटूट नियम था। वह प्रतिदिन सबसे पहले अपनी गैया का दूध दुहती और उसे मदनमोहन जी के लिए लेकर जाती। प्रभु भी अपनी इस भक्त से इतना प्रेम करते थे कि अक्सर उसके स्वप्न में आते और कभी माखन, कभी रबड़ी तो कभी गर्म दूध की मनुहार करते। पंजीरी भी उसी दिन वही बनाकर लाला को भोग लगाती।
किंतु, गरीबी का दुःख बड़ा निष्ठुर होता है।

मदनमोहन जी को दूध चढ़ाने के बाद जो बचता, उसे बेचकर पंजीरी का गुजारा मुश्किल से होता था। दो वक्त की रोटी भी नसीब न होती। विवश होकर, कभी-कभी मंदिर जाते समय वह यमुना जी के पावन जल की कुछ बूँदें दूध में मिला देती। मन ही मन कहती— "हे यमुना मैया, तू भी तो कृष्ण की पटरानी है, तेरे जल का दोष कैसा?"

फिर घर लौटकर वह अपने बाल-गोपाल के भजन-कीर्तन में ऐसी रमती कि उसे अपनी गरीबी और भूख का भी भान न रहता।

विपदा की घड़ी:

कहते हैं, ठाकुर जी अपने भक्तों की परीक्षा भी लेते हैं और लीला भी करते हैं।

एक दिन अनहोनी हो गई। यमुना जल मिलाते समय, अनजाने में एक नन्हीं सी मछली लोटे में आ गई। पंजीरी अपनी धुन में मगन मंदिर पहुंची और जैसे ही गर्भगृह में दूध उंड़ेलने लगी, वह मछली मदनमोहन जी के चरणों में जा गिरी।

यह दृश्य मंदिर के मुख्य गुसाईं (पुजारी) ने देख लिया।

उनका क्रोध सातवें आसमान पर पहुँच गया। वे गरज उठे, "अरी पगली! यह क्या अनर्थ कर दिया? तूने मंदिर अपवित्र कर दिया। निकल जा यहाँ से!"

गुसाईं ने न केवल दूध वापस किया बल्कि पंजीरी को खूब खरी-खोटी सुनाई और मंदिर में उसके प्रवेश पर ही प्रतिबंध लगा दिया।

भक्त का हठ:

पंजीरी पर तो जैसे वज्रपात हो गया। वह रोती-बिलखती अपनी कुटिया में पहुँची। आज उसे गुसाईं की डांट का दुख नहीं था, दुख इस बात का था कि उसके कन्हैया ने आज दूध नहीं पिया।

उसने घर के कोने में रखे ठाकुर जी के चित्र के सामने बैठकर उलाहना देना शुरू किया:

> "ठाकुर! मुझसे अपराध हुआ, मैं मानती हूँ। पर पानी तो मैं रोज मिलाती हूँ, तुमसे क्या छिपा है? अगर जल न मिलाऊँ तो पेट कैसे पालूँ? और उस बेचारी मछली का क्या दोष? वह तो तेरे चरणों में ही आई थी।

> पर आज मुझे सबसे ज्यादा दुख इस बात का है कि गुसाईं मुझे अपमानित करता रहा और तू चुपचाप देखता रहा? जा, अगर तू मेरा चढ़ाया दूध नहीं पिएगा, तो मैं भी अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगी। यहीं तेरे वियोग में प्राण त्याग दूँगी।"
शाम ढल गई, रात गहराने लगी। पंजीरी भूखी-प्यासी, रोते-रोते निढाल हो गई।

छलिया का आगमन:

मध्यरात्रि का समय था। तभी कुटिया के बाहर से एक मधुर और कोमल स्वर सुनाई दिया— "माई... ओ माई!"

पंजीरी ने चौंककर दरवाजा खोला। सामने एक अत्यंत सुंदर, सलोना सा किशोर खड़ा था। शरीर पर धूल लगी थी, चेहरा थका हुआ सा था, पर आँखों में ऐसी चमक थी कि अँधेरी रात भी रोशन हो जाए।
 * पंजीरी: "कौन हो बेटा? इतनी रात गए यहाँ कैसे?"

 * बालक: "मैया, मैं ब्रजवासी हूँ। मदनमोहन के दर्शन करने आया था, पर मंदिर के पट बंद हो गए। बड़ी जोर की भूख लगी है, कुछ खाने को दे दे तो तेरा बड़ा उपकार होगा।"

बालक की आवाज़ में ऐसा जादू था कि पंजीरी का सारा दुख पल भर में ममता में बदल गया।

 * पंजीरी: "अरे लला! यह घर तेरा ही है। तू इतनी दूर से थका-हारा आया है, अभी तेरे लिए रोटियां सेक देती हूँ।"

 * बालक: "नहीं मैया! रसोई मत बना, बहुत समय लगेगा। मुझे तो बस थोड़ा सा दूध दे दे, वही पीकर सो जाऊँगा।"

दूध का नाम सुनते ही पंजीरी की आँखों में फिर आँसू आ गए।
 
* पंजीरी (हिचकिचाते हुए): "बेटा, दूध तो है... पर सवेरे का है। 
और... और उसमें थोड़ा पानी भी मिला है। तू बैठ, मैं गैया को सहलाकर ताज़ा दूध दुह लाती हूँ।"

 * बालक (मचलते हुए): "अरे नहीं मैया! अब नहीं रहा जाता। दूध का नाम लेकर तूने मुझे और अधीर कर दिया। तू वही सवेरे वाला दूध दे दे। अगर तूने अभी दूध नहीं दिया तो मेरे प्राण निकल जायेंगे।"
पंजीरी हैरान थी। यह कैसा बालक है जो पानी मिले बासी दूध के लिए इतना मचल रहा है? उसने हार मानकर वही लोटा भर दूध बालक को दे दिया।

बालक ने एक ही सांस में दूध पिया और तृप्ति की डकार ली।
"वाह मैया! ऐसा अमृत जैसा दूध तो मैंने आज तक नहीं पिया। तू तो व्यर्थ ही बहाने बना रही थी। अब मेरा पेट भर गया, मुझे नींद आ रही है।"

इतना कहकर वह बालक वहीं कुटिया के कोने में सिमट कर सो गया।

प्रेम की ओढ़नी:

पंजीरी ने देखा कि बालक ठिठुर रहा है। जाड़े की रात थी। माई के पास ओढ़ने को कुछ खास न था, बस एक फटी-पुरानी ओढ़नी थी जिसे वह खुद ओढ़ती थी। ममता के वशीभूत होकर उसने वह ओढ़नी बालक को ओढ़ा दी और खुद एक कोने में बैठकर प्रभु का स्मरण करने लगी।

भूखे पेट और थकान के कारण उसकी आँख लग गई।

स्वप्न में उसने देखा कि स्वयं ठाकुर मदनमोहन जी उसके सामने खड़े हैं। वे मुस्कुराते हुए बोले:

> "मैया! तू मुझे भूखा मारेगी क्या? गुसाईं की बातों का बुरा मानकर तूने खुद भी कुछ नहीं खाया? देख, मैं तो तेरा दूध पीकर तृप्त हो गया। और सुन, तू दूध में पानी मिलाती है तो क्या हुआ? अच्छा है, पतला दूध जल्दी हजम हो जाता है! अब उठ और भोजन कर, तेरे भूखे रहने से मुझे पीड़ा होती है।"
पंजीरी हड़बड़ा कर जागी।
"लला... ओ लला!" उसने आवाज दी, लेकिन कुटिया में कोई नहीं था। वह बालक गायब था।

पंजीरी का रोम-रोम पुलकित हो गया। उसे समझते देर न लगी कि वह कोई साधारण बालक नहीं, स्वयं उसका छलिया कन्हैया था।
उसने खुशी-खुशी उठकर भोजन बनाया और ठाकुर जी को भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण किया।

लीला का रहस्य:

सुबह हुई तो पंजीरी ने देखा कि जिस जगह वह बालक लेटा था, वहां उसकी फटी हुई ओढ़नी नहीं थी, बल्कि सोने के तारों से जड़ा हुआ रेशमी पीतांबर रखा था। ठाकुर जी अपनी निशानी छोड़ गए थे और भक्त की फटी गुदड़ी ले गए थे।

उधर, मंदिर में जैसे ही गुसाईं जी ने पट खोले, उनके होश उड़ गए।
सिंहासन पर विराजमान मदनमोहन लाल जी ने अपना कीमती पीतांबर नहीं, बल्कि एक फटी-पुरानी मैली सी ओढ़नी ओढ़ रखी थी। प्रभु के चेहरे पर ऐसी मंद मुस्कान थी जैसे संसार का सबसे बड़ा सुख उन्हें इसी गुदड़ी में मिल रहा हो।

गुसाईं जी अभी इस रहस्य को सुलझा ही रहे थे कि पंजीरी हाथ में पीतांबर लिए मंदिर के द्वार पर आ पहुँची।

 * पंजीरी (भोलेपन से): "गुसाईं जी! देखो मेरे लाला की लीला। कल रात मेरी कुटिया पर आए, दूध पिया और जाते-जाते अपना पीतांबर छोड़ गए और मेरी फटी ओढ़नी उठा लाए। ये लो इनका बागा।"
गुसाईं जी सब समझ गए। उनकी आँखों से पश्चाताप के आँसू बह निकले। वे दौड़कर आए और पंजीरी के चरणों में गिर पड़े।

 * गुसाईं जी: "माई! मुझे क्षमा कर दे। मैं मदनमोहन की मूर्ति की पूजा करता रह गया और तूने अपने प्रेम से साक्षात मदनमोहन को पा लिया। मैंने भक्त और भगवान के बीच दीवार बनकर बहुत बड़ा अपराध किया है।"

 * पंजीरी (मुस्कुराते हुए): "अरे गुसाईं जी! इसमें आपका क्या दोष? यह तो लाला की पुरानी आदत है। उसे राजसी पीतांबर से ज्यादा अपने भक्तों के प्रेम की गुदड़ी में ही सुख मिलता है।"

मंदिर का प्रांगण "बांके बिहारी लाल की जय" के उद्घोष से गूँज उठा। उस दिन सबको समझ आ गया कि प्रभु वस्तु के नहीं, भाव के भूखे हैं।
।। जय जय श्री राधे ।।