आज के विचार
( प्रीत की यह कैसी नई रीत है.....)
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प्रेम सीधी चाल चलता कहाँ हैं ! ....प्रेम की नदी सीधी बहती कहाँ है !
प्रेम नगरी में रोना, हँसनें को कहते हैं........और हँसना यानि रोना ।
प्रेम पन्थ में "ना" यानि "हाँ".....और हाँ का मतलब "ना" ।
प्रेम कुञ्ज में प्रगाढ़ मिलन यानि विरह, और विरह में मिलन की अनुभूति।
ये लीलाएं चल रही हैं निकुञ्ज में......निकुञ्ज यानि श्रीधाम वृन्दावन ।
वृन्दावन यानि 'युग्मतत्व" की विहार स्थली ........जहाँ सत्य और आनन्द मिल रहे हैं .........केलि चल रही है ..........
कब से ?
ये प्रश्न व्यर्थ है.........सृष्टी कब से ? इसका हिसाब फिर भी लगाया जा सकता है .........ब्रह्मा विष्णु शंकर कब से हैं ? इसका भी हिसाब शायद कोई लगा ले ........पर ये ब्रह्म और आल्हादिनी की यह प्रेम केलि कब से ?....सत्य और आनन्द की ये केलि कब से ? .......इसका कोई पता नही ....अनादि काल से चल ही रही है .........और चलती ही रहेगी ......महाप्रलय कितनें हुए ......ब्रह्मा विष्णु महेश कितनें आये और कितनें गए ......पर युगल की ये प्रेम लीला अनवरत चल ही रही है ।
नही नही ....अवतार काल में भी जब पृथ्वी में श्रीराधारानी और श्याम सुन्दर लीला करनें गये थे ........तब भी ये निकुञ्ज की लीलाएं चल ही रही थीं ......ये कभी रूकती नही हैं ।
हाँ हाँ .....एक बात तो सुनो ......"मिले रहत मानों कबहुँ मिले ना" ।
दोनों मिले हैं ......मिले ही रहते हैं .....फिर भी प्यास कम नही होती ।
अद्भुत है ये प्रेम केलि इन युगल की ।
छोड़िये इन गम्भीर चर्चा को .......चलिये - ध्यान में बैठते हैं ..........
और चलते हैं उसी नित्य निकुञ्ज में ......जहाँ बहुत कुछ चल रहा है ।
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श्रीधाम वृन्दावन प्रेम का एक कमल पुष्प है .......उस कमल में जो पीले पीले केशर हैं .......वो सखियाँ हैं .......उन केशरों में जो पराग है ....वह श्री कृष्ण हैं ........और उन पराग में जो मकरन्द है ......वो श्रीराधारानी हैं । इस तरह दिव्य ध्यान कीजिये .........आहा !
प्रातः होनें में कुछ ही समय शेष है.........दिव्य श्रीधाम वृन्दावन है ......प्रेम महल में दोनों युगलवर शयन किये हैं .......
पर ये क्या ! एकाएक श्री श्याम सुन्दर कोई सपना देख - उठे ।
आँखें उनकी मुदीं हुयी हैं ........पर जोर से जोर से पुकार रहे हैं -
हे श्रीराधे ! हे प्राणेश्वरी ! हे प्रियतमें ! आप कहाँ हो ? मुझे छोड़ कर आप कहाँ गयीं ? मेरे प्राण आप में ही बसते हैं ......ये जानते हुए भी आपनें मुझे कैसे छोड़ दिया.....हिलकियाँ छूट गयीं श्याम सुन्दर की ।
मेरे प्राण तड़फ़ रहे हैं.......आप आओ......आप आओ !
बैठ गए हैं श्याम सुन्दर .....उनके कमल नयन से अश्रु गिर रहे हैं.........
पर जैसे ही अपनें समीप में देखा........श्रीजी तो यहीं हैं ........श्रीराधा रानी को अपनें पास में देखकर उनके आनन्द की सीमा नही रही .......अरे ! मन ही मन हँसे .........अब तक जो दुःख के आँसू बह रहे थे वे आनन्दाश्रु के रूप में फिर बहनें लगे थे........".मैं भी बाबरो है गयो ...........मेरी प्यारी ....मेरी प्राण बल्लभा तो यहीं हैं" ।
अपलक देखनें लगे थे........अपनी श्रीराधा रानी को ।
पर श्याम सुन्दर के नेत्रों का ताप अत्यन्त कोमलांगी श्रीराधारानी कैसे सह लेतीं ......उनकी नींद खुल गयी ।
अरे ! प्यारे ! आप उठ गए ? क्या रात बीत गयी ? और हे श्याम सुन्दर ! आप बैठे क्यों हो ? फिर आपके नेत्रों से ये अश्रु ?
श्रीराधा रानी भी उठकर बैठ जाती हैं .....और बड़े प्रेम से कज्जल मिश्रित श्याम सुन्दर के अश्रुओं को अपनें आँचल से पोंछ देती हैं ।
हाँ ......रात्रि तो बीत गयी............बड़ी जल्दी बीत गयी रात्रि !
श्रीश्याम सुन्दर श्रीजी के कपोलों को चूमते हुए बोले थे ।
मेरी राधे ! मैनें एक सपना देखा.........बहुत बुरा सपना था ......
मैने सपना देखा - कि आप मुझ से दूर चली गई हो .......बहुत दूर ......मैं पुकारता हुआ आपके पीछे जा रहा हूँ ...........पर आप बस चली जा रही हो .....मेरी और देखती भी नही हो ..........
इतना कहते हुये फिर श्याम सुन्दर अपनी श्रीजी को हृदय से लगा लेते हैं ........पर ..........श्रीराधा रानी ये सब सुनकर हँसती हैं .........
आप हँस रही हो ? मेरे हृदय की धड़कन तो देखो !
श्रीजी का हाथ लेकर अपनें वक्ष से लगाते हैं श्याम सुन्दर ।
पर आप ऐसा सपना क्यों देखते हो !........आप और हम कोई अलग तो हैं नहीं ........जैसे - जल और तरंग अलग नही हैं ....जैसे - अग्नि और ताप अलग नही है .....जैसे - दूध और उसकी सफेदी अलग नही हैं....ऐसे ही हम दोनों भी कहाँ अलग हैं ?
अच्छा बताओ ! क्या जल और तरंग को कोई अलग कर सकता है ?
श्रीराधा जी जब पूछती हैं .....तब श्याम सुन्दर बड़े ही मासूमियत से अपना सिर "नही" में हिलाते हैं ।
पर मैं आपका मुखचन्द्र बिना देखे रह नही सकता .........मुझे लगता है ....मैं आपको देखता रहूँ .......बस देखता रहूँ ........पर हाँ, एक बात और.......ये जो पलक हैं ना ....यही विघ्न डालते हैं ..........ये जब गिरते हैं उस क्षण में मुझे ऐसा लगता है कि घनें अन्धकार नें मुझे घेर लिया है .......फिर एकाएक हिलकियों से श्याम सुन्दर रो पड़े ......मेरी आपसे बस एक प्रार्थना है ...........प्यारी ! ये मुख चन्द्र मेरे नयनों के आगे ही रहे ........बस मुझे यही चाहिये ।
पर ये क्या ! प्यारे ! ये क्या कर रहे हो आप ?
श्रीराधा जी नें हाथ पकड़ लिया श्याम सुन्दर का .........
पर ये तो रसिक शिरोमणि हैं........ऐसे कहाँ मानते ..........चरण पकड़ लिये श्री राधा रानी के ............चरणों में टप् टप् टप् आँसू गिरनें लगे ............हे मेरी प्राण बल्लभा श्रीराधा ! मेरी एक ही कामना है कि इन चरणारविन्द का मुझे दास बनाकर कभी छोड़ना नहीं ।
इस सेवक को अपना मान कर कभी त्यागना नहीं ।
इतना सुनते ही श्रीराधा रानी नें श्याम सुन्दर को अपनें हृदय से लगा लिया ....और प्रगाढ़ आलिंगन में बांध लिया ।
"पुलकि प्रिया लियें लाए हिये सों !
ढरकी जुरावनि वदन वदन की, यह छबि नित रहू लागी जिये सों !!
सिचनि सुधा भुजनि की भीचनि, निरखि नगीचनि भाव भिये सों !!
"श्रीहरिप्रिया" पोष परिपागे, अनुरागे रस दिये लिए सों !! "
शेष "बृजरस चर्चा" कल -